1857 की क्रान्ति
1857 की क्रान्ति की कहानी : भारत के बारे में हमेशा कहा जाता था कि यहां के लोग राजनीति में ज्यादा चूं-चपड़ नहीं करते थे. ‘कोऊ नृप होए, हमें का हानि.’ कोई भी आ के राजा बन गया, जनता को कोई दिक्कत नहीं थी. पर 1857 में पहली बार सैनिकों के अलावा व्यापारी, किसान और साधु तक लड़े थे. लड़ने वाले राजा कई तरह के स्वभाव और बैकग्राउंड वाले थे. ‘शायर’ बादशाह बहादुर शाह जफ़र को सबका नेता बनाया गया था. पेशवा बाजीराव द्वितीय के गोद लिए हुए नाना साहब, 80 साल के बूढ़े कुंवर सिंह, तांत्या टोपे और बख्त खान भी हर जगह से लड़ रहे थे. फिर रानी लक्ष्मीबाई जो बेटे को पीठ पर बांधकर लड़ती थीं. बेगम हज़रत महल, रानी ईश्वरी देवी, तुलसीपुर की रानी सबने भयानक लड़ाई लड़ी थी. इतनी रानियों का जंग करना किसी भी देश के इतिहास में पहला मौका था. ब्रिटिश अफसर ह्यू रोज ने कहा था: सारे विद्रोहियों में रानी लक्ष्मीबाई ही लड़ाका थी. सारे विद्रोहियों में अकेली ‘मर्द’. रानी लक्ष्मीबाई के साथ ही उनकी बचपन की सखी झलकारीबाई का भी नाम आता है. वो दलित समुदाय से आती थीं. उन्होंने लक्ष्मीबाई के लिए अपनी जान दे दी थी. Read Biogra...